शुक्रवार 30 अक्टूबर 2026 - 16:46
इस्लामी समाज की ताकत अल्लाह की बंदगी से पैदा होती है,घमंड और ख़ुदपसंदी से नहींः  आयतुल्लाह सईदी

हौज़ा / कुम अलमुकद्दस के इमाम ए जुमआ ने कहा,इस्लामी व्यवस्था के सभी संस्थानों के लिए हज़रत फ़ातिमा ज़हेरा स.अ. की प्रसन्नता और नाराज़गी ही मानदंड होनी चाहिए।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , कुम के इमाम ए जुमआ आयतुल्लाह सैयद मोहम्मद सईदी ने अय्यामे फ़ातेमिया के अवसर पर जुमआ की नमाज़ के खुतबे में कहा कि अल्लाह तआला ने हज़रत फ़ातिमा ज़हेरा सलामुल्लाह अलैहा की प्रसन्नता और नाराजगी को अपनी प्रसन्नता और नाराजगी से जोड़ दिया है, ताकि उम्मत को सत्य के मार्ग पर कायम रखा जा सके। आज का महत्वपूर्ण संदेश यह है कि इस्लामी गणराज्य ईरान के सभी संस्थानों को इमाम अली अलैहिस्सलाम की विलायत से जुड़े रहते हुए हर मामले में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की प्रसन्नता और नाराजगी को अपना मानदंड बनाना चाहिए।

उन्होंने मस्जिद ए नबवी में हज़रत फ़ातिमा ज़हेरा (स.अ.) के ऐतिहासिक खुतबे का उल्लेख करते हुए कहा कि आपने अपने आंदोलन और संघर्ष के माध्यम से उन साजिशों को उजागर किया, जिनके जरिए मुनाफिक लोग इस्लामी व्यवस्था को नुकसान पहुंचाना चाहते थे। आपने ग़दीर-ए-खुम की महान घटना की अनदेखी करने वाले मदीना के वादाखिलाफ लोगों को भी फटकार लगाई।

आयतुल्लाह सईदी ने कहा कि मुनाफिकों के संबंध में दो काम जरूरी हैं। पहला, उनकी विशेषताओं, साजिशों और फितनों को बयान करना और दूसरा, उनके असली चेहरों को जनता के सामने उजागर करना। यदि किसी आंदोलन या क्रांति में मुनाफिकों की पहचान नहीं कराई जाती तो वे अपूरणीय नुकसान पहुंचा सकते हैं। पैगंबर-ए-इस्लाम (स.अ.व.) ने भी आयतों, रिवायतों और विभिन्न घटनाओं के माध्यम से मुनाफिकों की पहचान कराई और उनके संबंध में मुसलमानों की जिम्मेदारी स्पष्ट की।

उन्होंने आगे कहा कि मुनाफिकों की पहचान कराने और उनके वास्तविक चेहरों को सामने लाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) ने निभाई। आपके खुतबे और व्यवहार ने उन लोगों को बेनकाब कर दिया, जिन्होंने इस्लाम को नुकसान पहुंचाने के लिए अपने चेहरों पर नकाब डाल रखा था।

उन्होंने पैगंबर-ए-इस्लाम स.अ.व.की इस हदीस का हवाला दिया:

«إِنَّ اللَّهَ لَيَغْضَبُ لِغَضَبِ فَاطِمَةَ»

बेशक अल्लाह फ़ातिमा के गजब (नाराजगी) से नाराज होता है और उनकी प्रसन्नता से प्रसन्न होता है।

उन्होंने कहा कि आज भी कुछ राजनीतिक वर्ग जनता की प्रसन्नता हासिल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन पैगंबर-ए-इस्लाम (स.अ.व.) ने स्पष्ट कर दिया है कि वास्तविक मानदंड हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की प्रसन्नता और नाराजगी है।

जुमआ की नमाज़ के दूसरे खुतबे में उन्होंने युवा दिवस और शहीद हुसैन फहमीदेह की बरसी का उल्लेख करते हुए उन्हें युवाओं के लिए आदर्श बताया। उन्होंने गैर-सैन्य रक्षा (डिफेंस-ए-ग़ैर-आमिल) को खतरों के मुकाबले में एक प्रभावी रक्षा प्रणाली बताते हुए कहा कि इसकी सफलता के लिए अधिकारियों का सहयोग और जनता की भागीदारी आवश्यक है।

आयतुल्लाह सईदी ने 13 आबान 1358 हिजरी शम्सी को अमेरिकी जासूसी केंद्र पर कब्जे की वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए कहा कि आज अमेरिका के साथ टकराव का मुख्य मुद्दा पश्चिम एशिया से उसकी अनुचित दखलंदाजी को समाप्त करना है।

कुम के इमाम ए जुमआ ने पहले खुतबे में सूरह अल-बक़रा की आयत 197 का हवाला देते हुए कहा कि आखिरत के सफर के लिए सबसे बेहतरीन ज़ादे राह तकवा है। उन्होंने सूरह अल-फतह की आयत 29 की व्याख्या करते हुए कहा कि एक वास्तविक इस्लामी समाज दुश्मनों के मुकाबले में मजबूत और अपने लोगों के प्रति दयालु होता है, लेकिन उसकी ताकत और आपसी प्रेम की असली बुनियाद अल्लाह की इबादत और बंदगी है।

उन्होंने कहा कि इस्लामी समाज की ताकत घमंड और आत्ममुग्धता से नहीं, बल्कि अल्लाह के सामने विनम्रता और उसकी बंदगी से पैदा होती है। समाज जितना अधिक शक्तिशाली होता जाए, उसे उतना ही अधिक अल्लाह के सामने झुकना चाहिए। इबादत इंसान को समाज से अलग नहीं करती, बल्कि एक बेहतर, मजबूत और आदर्श समाज के निर्माण की बुनियाद तैयार करती है।

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